Friday, June 2, 2023

Conflict Theory of Social Change- सामाजिक परिवर्तन का संघर्षवादी सिद्धांत :-

 

Conflict Theory of Social Change- सामाजिक परिवर्तन का संघर्षवादी सिद्धांत:-

          हिगेल, कार्ल मार्क्स, A W स्माल, लेविस A. कोजर, राल्फ डाहरेनडार्फ आदि संघर्षवादी सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख समाजशास्त्रीय है.

प्रमुख संघर्षवादी सिद्धांत:-

          GWF हीगेल (1770-1831):-

  • द्वंद्ववाद
  • वाद एवं प्रतिवाद (Thesis and Antithesis)
  • समाज में द्वंद्व मानव मस्तिष्क की चेतना से उत्तपन्न होती है.
  • जिस समाज में जैसी चेतना होगी वैसी ही समाज होगी.

          कार्ल मार्क्स (1818-1883):-

  • द्वंद्व का आधार वास्तु है न कि चेतना .
  • समाज में द्वंद्व भौतिक वस्तुओं से उत्त्पन्न होती है.
  • समाज में जिस प्रकार की भौतिक वस्तुएं होंगी उसी प्रकार की वह समाज होगी.
  • “मैंने हीगेल के द्वंद्ववाद को सिर (चेतना/मस्तिष्क) के बल खड़ा पाया और मैंने उसे पैरों(भौतिक वस्तुएं ) के बल खड़ा कर दिया.”
  • पूंजीपतियों में मिथ्या वर्ग चेतना होती है.
  • आर्थिक निर्धारणवाद के आधार पर समाज में परिवर्तन की व्याख्या किया.
  • “अभी तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है.”
  • पूंजीपति(have) और मजदुर/ श्रमिक(have not) (सर्वहारा वर्ग)
  • सामाजिक संरचना के प्रमुख दो तत्व होते है.-
    • अधि संरचना (super structure)- इसके अंतर्गत कानून, धर्म,संस्कृति,सरकार,परिवार,दर्शन, शिक्षा, राजनीति आदि आते है. 
    • आधार भूत संरचना (Sub structure/ basic structure/ infrastructure)- इसके अंतर्गत श्रम,भूमि, पूंजी, तकनीकी,उत्पादन की प्रकिया/प्रणाली, उत्पादन के साधन, उत्पादन के सम्बन्ध आदि आते है.

          AW स्माल (1854-1926):-

  • समाज में संघर्ष का आधार व्यक्तिगत स्वार्थ है.
  • स्वार्थ मानव की क्रियाशीलता का सबसे आसन आधार है.
  • व्यक्तिगत स्वार्थ –

1.     स्वास्थ्य स्वार्थ

2.     संपत्ति स्वार्थ

3.     प्रतिष्ठा स्वार्थ

4.     ज्ञान स्वार्थ

5.     सुन्दरता स्वार्थ

6.     अधिकार स्वार्थ

  • समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा समाज संघर्ष से शांति (Pacification) की ओर बढाता है.

          लेविस A कोजर (1913-2003):-

  • Book- The Functions of social conflict – 1956
  • समाज में संघर्ष दो प्रकार की होती है-

1.     संगठनात्मक

2.     विघटनात्मक

·      वास्तविक संघर्ष- यथार्थवादी

·      अवास्तविक संघर्ष – यथार्थवादी

  • समाज में संघर्ष का प्रमुख कारण स्वार्थों की टकराहट है.
  • स्वार्थ का स्वरुप – आर्थिक, रजनीतिक, सामाजिक कुछ भी हो सकती है.
  • संघर्ष समाज में सुरक्षा कवच (Safety Valve) का कार्य करता है.

          राल्फ डाहरेनडार्फ (1929-):-

  • Book- class and class conflict in industrial society.
  • सामाजिक व्यवस्था का आधार शक्ति का सोपानक्रम है.
  • समाज में एकरूपता एवं अनुरूपता उत्पीडन से पैदा होती है.
  • समाज शक्ति एवं सत्ता पर आधारित होती है.
  • समाज में संघर्ष का आधार आर्थिक नहीं रजनीतिक है.
  • समाज में व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति सत्ता के द्वारा करता है.जिसे उत्पीडन का सिद्धांत (theory of coercion)कहते है.
  • इनके सिद्धांत में सत्ता  की संरचना है-

1.     शासन(domination) – सत्ता का दुरूपयोग

2.     दमन (subjection)

  • इन दोनों के कारण समाज में संघर्ष की परिणिति होती है.
  • सत्ता का असमान वितरण ही संघर्ष का मूल स्रोत है.

 

  • “ सहयोग भी एक तरह की प्रतियोगिता ही है.” -- ES Bogardus.
  •  “परिवर्तन द्वंद्व से नहीं बल्कि समझौता से अता है.” – PS कोहेन
  • “संघर्ष गतिरोध पैदा कर सकता है, परिवर्तन नहीं. “ – PS कोहेन

 

 

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