सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत:- विको, पेरेटो, स्पेंगलर, सोरोकिन,
टायनबी
·
सामाजिक परिवर्तन एक सर्पिलाकार
प्रक्रियां है.- विको
·
Bogardus ने विको को समाजशास्त्र का
जनक मन है.
V. Pareto –(1848-1923)
- संभ्रांत\विशिष्ठ वर्ग के परिभ्रमण का सिद्धस्न्त
- संभ्रांत – डाक्टर, वकील, कुशल लेखक, व्यापारी, चोर, ठग, सट्टेबाज आदि
- संभ्रांत – Elites शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम G मोस्का और R माइकेल ने किया था
- “विशिष्ठ / संभ्रांत वर्ग के अंतर्गत वैसे व्यक्ति आते है जिन्होंने अपने जीवन के कार्य क्षेत्र में उच्चतम स्तर का कार्य किया है “ – तिमासेफ़
- “विशिष्ठ वर्ग का प्रत्यावर्तन, उतार-चड़ाव पदारोहण सामाजिक अस्तित्व का नियम है.- E. ओसीपोव (a history of classical sociology-1989)
Cerculation of Elites – विल्फ्रेड पेरेटो के अनुसार तीन क्षेत्रों
में होता है.-
1. रजनीतिक क्षेत्र (Political area)-
·
शासी विशिष्ठ वर्ग Elites –शेर (इनमे
द्वितीयक श्रेणी के विशिष्ठ चालक की प्रधानता होती है.)
·
गैर-शासी विशिष्ठ वर्ग Non-Elites -लोमड़ी
(इनमे प्राथमिक श्रेणी के विशिष्ठ चालक की प्रधानता होती है.)
2. आर्थिक क्षेत्र (Economic Area)-
·
निश्चित आय वाला – पट्टे वाला (Rentier)
·
अनिश्चित आय वाला –सटोरिया /सट्टेबाज (Speculator)
3. आदर्शात्मक क्षेत्र –
·
विश्वासी (Believer)
· अविश्वासी (Non-Believer)
- o शेर और लोमड़ी शब्द को मैकियावेली की बुक से लिया है.
- o इतिहास विशिष्ठ वर्ग की एक कब्रगाह है.(Mind and society Vol.3)
- o “व्यक्तियों का उच्च से निम्न वर्ग तथा उसकी विपरीत दिशा में भी परिभ्रमण होता है.” – डान मार्टिन्डेल
- o विल्फ्रेड़ो पैरेटो प्रजातंत्र के विरोधी और तानाशाही के समर्थक थे.
- o ये बुर्जुआजी वर्ग के समर्थक थे.
- o पेरेटो को बुर्जुआजी का कार्ल मार्क्स कहा जाता है.
- o “पेरेटो के परिभ्रमण का सिद्धांत बहुत ज्यादा सामान्य व अपूर्ण है. इसमे बहुत सुधार एवं विकास की जरुरत है.”- PA सोरोकिन
Oswald Spengler(1880-1936)-
·
Book – the decline of the
weast-1926
·
ओसवाल्ड स्पेंगलर ने 8 प्रमुख
संस्कृतियों का अध्ययन किया है-
1.
इजिप्ट
2.
मेसोपोटामिया
3.
हिन्दू
4.
चीनी
5.
अरेवियन
6.
मयान
7.
पश्चिमी
8. क्लासिकल / अपोलोनियन
·
आदिम जातीय समाज इतिहास हीन है. – Historyless
·
संस्कृति सावयव की तरह है.
और विश्व इतिहास उसकी सामूहिक जीवनी है.
·
संस्कृतियों में उत्थान और पतन की
प्रक्रियां चलती रहती है.
·
संस्कृतियों का भी जीवन चक्र बचपन, युवा,
परिपक्वता और बुड़ापा के चरणों से होकर गुजरता है.
·
किसी भी संस्कृति का जीवन कल 1000 वर्ष होता
है.
P.A. सोरोकिन (1889-1968)-
- Book – Social and Cultural Dynamics – vol. 4 -1941
- मानव इतिहास के 3000 वर्षों का अध्ययन किया है.
- अनेक युद्धों, आंदोलनों और क्रांतियों का अध्ययन किया है.
- संस्कृति का चक्रीय सिद्धांत –
1.
इन्द्रियपरक संस्कृति –
- यह अनुभविक सत्य (Empirical Reality)पर आधारित सभी वस्तुएं शामिल होती है.
- भौतिकवादी सुख पर आधारित होती है.
- लोगो का जीवन दर्शन मौज-मस्ती का होता है.
- खाओ-पिओ और मौज करो पर आधारित
- इस संस्कृति को उपयोगितावाद या सुखवाद कहते है.
2.
आदर्शात्मक संस्कृति –
- यह संस्कृति आत्मा, मस्तिष्क व आध्यात्मिक विचारों से सम्बंधित होता है.
- यह अवस्था परम सत्य पर आधारित होती है.
- अभौतिक विचारों की स्वीकृति होती है.
जैसे- मध्यकालीन यूरोप की संस्कृति
3.
आदर्शवादी संस्कृति –
- इसमे इन्द्रियपरक और आदर्शात्मक दोनों के तत्व पाए जाते है.
- इसमे भौतिक और अध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय होता है.
सीमाओं का सिद्धांत (Limitation Theory)-
संस्कृति
के प्रत्येक स्तर अपने एक निश्चित स्थिति पर पहुचने के बाद वापस दुसरे संस्कृति के
स्तर पर आ जाते है.
अंतर्भूत परिवर्तन का सिद्धांत (Priciple of Immanent Change)-
एक
सांस्कृतिक व्यवस्था से दुसरे सांस्कृतिक व्यवस्था में परिवर्तन निश्चित व अनियमित
रूप से होता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.
Arnold J. Taynbee (1899-1975)-
o Book – अ study of history – 10 vol. –
(1934-63)
o दुनियां के 21 सभ्यताओं का अध्ययन
किया.
o प्रत्येक सभ्यता की एक निश्चित चक्रीय
रीती से जन्म और मृत्यु होती है.
चुनौती और प्रतिउत्तर
का सिद्धन्त (Principle of challenge and response)-
1. भौगोलिक परिस्थिति चुनौती
2. सामाजिक परिस्थिति चुनौती
1.
आतंरिक चुनौती – स्वदेशी सर्वहारा वर्ग
2.
वाह्य चुनौती – वाह्य सर्वहारा वर्ग –
बर्बर जाति
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