Friday, May 19, 2023

Cyclical Theory of Social Change – सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत

 

सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत:- विको, पेरेटो, स्पेंगलर, सोरोकिन, टायनबी

·      सामाजिक परिवर्तन एक सर्पिलाकार प्रक्रियां है.- विको

·      Bogardus ने विको को समाजशास्त्र का जनक मन है.

          V. Pareto –(1848-1923)

  • संभ्रांत\विशिष्ठ वर्ग के परिभ्रमण का सिद्धस्न्त
  • संभ्रांत – डाक्टर, वकील, कुशल लेखक, व्यापारी, चोर, ठग, सट्टेबाज आदि
  • संभ्रांत – Elites शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम G मोस्का और R माइकेल ने किया था
  • “विशिष्ठ / संभ्रांत वर्ग के अंतर्गत वैसे व्यक्ति आते है जिन्होंने अपने जीवन के कार्य क्षेत्र में उच्चतम स्तर का कार्य किया है “ – तिमासेफ़
  • “विशिष्ठ वर्ग का प्रत्यावर्तन, उतार-चड़ाव पदारोहण सामाजिक अस्तित्व का नियम है.- E. ओसीपोव (a history of classical sociology-1989)

Cerculation of Elites – विल्फ्रेड पेरेटो के अनुसार तीन क्षेत्रों में होता है.-

1.      रजनीतिक क्षेत्र (Political area)-

·      शासी विशिष्ठ वर्ग Elites –शेर (इनमे द्वितीयक श्रेणी के विशिष्ठ चालक की प्रधानता होती है.)

·      गैर-शासी विशिष्ठ वर्ग Non-Elites -लोमड़ी (इनमे प्राथमिक श्रेणी के विशिष्ठ चालक की प्रधानता होती है.)

2.      आर्थिक क्षेत्र (Economic Area)-

·      निश्चित आय वाला – पट्टे वाला (Rentier)

·      अनिश्चित आय वाला –सटोरिया /सट्टेबाज (Speculator)

3.      आदर्शात्मक क्षेत्र –

·      विश्वासी (Believer)

·      अविश्वासी (Non-Believer)

  • o   शेर और लोमड़ी शब्द को मैकियावेली की बुक से लिया है.
  • o   इतिहास विशिष्ठ वर्ग की एक कब्रगाह है.(Mind and society Vol.3)
  • o   “व्यक्तियों का उच्च से निम्न वर्ग तथा उसकी विपरीत दिशा में भी परिभ्रमण होता है.” – डान मार्टिन्डेल
  • o   विल्फ्रेड़ो पैरेटो प्रजातंत्र के विरोधी और तानाशाही के समर्थक थे.
  • o   ये बुर्जुआजी वर्ग के समर्थक थे.
  • o   पेरेटो को बुर्जुआजी का कार्ल मार्क्स कहा जाता है.
  • o   “पेरेटो के परिभ्रमण का सिद्धांत बहुत ज्यादा सामान्य व अपूर्ण है. इसमे बहुत सुधार एवं विकास की जरुरत है.”- PA सोरोकिन

Oswald Spengler(1880-1936)-

·      Book – the decline of the weast-1926

·      ओसवाल्ड स्पेंगलर ने 8 प्रमुख संस्कृतियों का अध्ययन किया है-

1.     इजिप्ट

2.     मेसोपोटामिया

3.     हिन्दू

4.     चीनी

5.     अरेवियन

6.     मयान

7.     पश्चिमी

8.     क्लासिकल / अपोलोनियन

·      आदिम जातीय समाज इतिहास हीन है. – Historyless

·      संस्कृति सावयव की तरह है. और विश्व इतिहास उसकी सामूहिक जीवनी है.

·      संस्कृतियों में उत्थान और पतन की प्रक्रियां चलती रहती है.

·      संस्कृतियों का भी जीवन चक्र बचपन, युवा, परिपक्वता और बुड़ापा के चरणों से होकर गुजरता है.

·      किसी भी संस्कृति का जीवन कल 1000 वर्ष होता है.

P.A. सोरोकिन (1889-1968)-

  • Book – Social and Cultural Dynamics – vol. 4 -1941
  • मानव इतिहास के 3000 वर्षों का अध्ययन किया है.
  • अनेक युद्धों, आंदोलनों और क्रांतियों का अध्ययन किया है.
  • संस्कृति का चक्रीय सिद्धांत –

1.      इन्द्रियपरक संस्कृति –

  • यह अनुभविक सत्य (Empirical Reality)पर आधारित सभी वस्तुएं शामिल होती है.
  • भौतिकवादी सुख पर आधारित होती है.
  • लोगो का जीवन दर्शन मौज-मस्ती का होता है.
  • खाओ-पिओ और मौज करो पर आधारित
  • इस संस्कृति को उपयोगितावाद या सुखवाद कहते है.

2.      आदर्शात्मक संस्कृति –

  • यह संस्कृति आत्मा, मस्तिष्क व आध्यात्मिक विचारों से सम्बंधित होता है.
  • यह अवस्था परम सत्य पर आधारित होती है.
  • अभौतिक विचारों की स्वीकृति होती है.

जैसे- मध्यकालीन यूरोप की संस्कृति

3.      आदर्शवादी संस्कृति –

  •  इसमे इन्द्रियपरक और आदर्शात्मक दोनों के तत्व पाए जाते है.
  • इसमे भौतिक और अध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय होता है.

 

सीमाओं का सिद्धांत (Limitation Theory)-

          संस्कृति के प्रत्येक स्तर अपने एक निश्चित स्थिति पर पहुचने के बाद वापस दुसरे संस्कृति के स्तर पर आ जाते है.

 

अंतर्भूत परिवर्तन का सिद्धांत (Priciple of Immanent Change)-

          एक सांस्कृतिक व्यवस्था से दुसरे सांस्कृतिक व्यवस्था में परिवर्तन निश्चित व अनियमित रूप से होता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.

Arnold J. Taynbee (1899-1975)-

o   Book – अ study of history – 10 vol. – (1934-63)

o   दुनियां के 21 सभ्यताओं का अध्ययन किया.

o   प्रत्येक सभ्यता की एक निश्चित चक्रीय रीती से जन्म और मृत्यु होती है.

 

चुनौती और प्रतिउत्तर का सिद्धन्त (Principle of challenge and response)-

1.      भौगोलिक परिस्थिति चुनौती

2.      सामाजिक परिस्थिति चुनौती

1.      आतंरिक चुनौती – स्वदेशी सर्वहारा वर्ग

2.      वाह्य चुनौती – वाह्य सर्वहारा वर्ग – बर्बर जाति

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